विभिन्न अधिनियमों की प्रमुख विशेषताएँ जिनके लिए केंद्रीय औद्योगिक संबंध तंत्र प्रवर्तन एजेसी है

केंद्रीय औद्योगिक संबंध तंत्र निम्नलिखित श्रम कानूनों को ऐसे उद्योगों व स्थापनाओं में लागू करने के लिए उत्तरदायी है जिनके संबंध में केंद्र सरकार समुचित सरकार है।

(i) मजदूरी संदाय अधिनियम, 1936

रेल, खादानें/तेल क्षेत्र, वायु परिवहन और प्रमुख पत्तनों की स्थापनाओं के संबंध में केंद्रीय सरकार समुचित सरकार है। नियोजक कामगारों की मजदूरी को नहीं रोक सकते हैं और न ही अनधिकृत कटौती कर सकते हैं। मजदूरी की अवधि के अंतिम दिन के पश्चात विनिर्दिष्ट दिन से पहले मजदूरी का भुगतान कर दिया जाना चाहिए। कामगारों पर केवल उन्हीं चूकों अथवा कृत्यों के लिए जुर्माना किया जा सकता है, जिन्हें समुचित प्राधिकारी ने अनुमोदित किया हो और जुर्माना की राशि मजदूरी की राशि के तीन प्रतिशत के बराबर होगी। यदि मजदूरी के भुगतान में विलंब होता है अथवा गलत तरीके से कटौती की जाती है तो मजदूर अथवा उनके श्रमिक संघों द्वारा दावा दायर किया जा सकता है।

(ii) न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, 1948

न्यूनतम मजदूरी अधिनियम सरकार को रोजगार विशेष में काम करने वाले कर्मचारियों के लिए न्यूनतम मजदूरी निर्धारित करने की शक्तियाँ प्रदान करता है। यह अधिनियम सरकार को समुचित अंतराल के पश्चात जो पांच वर्ष से अधिक नहीं हो, के पश्चात पहले से निर्धारित न्यूनतम मजदूरी की समीक्षा करने और उन्हें संशोधित करने का अधिकार प्रदान करता है। केंद्रीय सरकार, उसके द्वारा उसके प्राधिकार के अंतर्गत अथवा रेल प्रशासन अथवा खादानों के संबंध में, तेल क्षेत्र अथवा प्रमुख पत्तनों अथवा केंद्रीय अधिनियम के अंतर्गत स्थापित किसी निगम में अथवा इसके अधीन चलाए जाने वाले किसी अनुसूचित रोजगार के संबंध में समुचित अभिकरण है। अन्य अनुसूचित रोजगार के संबंध में राज्य सरकारें समुचित अभिकरण हैं।

केंद्र सरकार का केंद्रीय लोक निर्माण विभाग, रक्षा मंत्रालय इत्यादि द्वारा किए जाने वाले भवन एवं अन्य निर्माण गतिविधियों से तथा रक्षा और कृषि मंत्रालयों के अधीन कृषि फार्मों से सीमित सरोकार रहता है। इस प्रकार के ज्यादातर रोजगार राज्य सरकारों के क्षेत्राधिकार में आते हैं और राज्य सरकार द्वारा ही उनके क्षेत्राधिकार में आने वाले अनुसूचित रोजगार के संबंध में मजदूरी तय करना/संशोधित करना और इनका कार्यान्वयन सुनिश्चित किया जाना अपेक्षित है।

केंद्रीय क्षेत्र में न्यूनतम मजदूरी को केंद्रीय औद्योगिक संबंध तंत्र द्वारा लागू किया जाता है। केंद्रीय सरकार ने केंद्रीय क्षेत्राधिकार में आने वाले 40 अनुसूचित रोजगार के संबंध में न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, 1948 के अंतर्गत न्यूनतम मजदूरी निर्धारित की है।

(iii) बोनस संदाय अधिनियम, 1965


यह अधिनियम सभी कारखानों तथा उस प्रत्येक स्थापना पर लागू है जिसमें बीस अथवा अधिक कामगार कार्यरत हैं। बोनस संदाय अधिनियम, 1965 में न्यूनतम बोनस मजदूरी का 8.33% दिए जाने का प्रावधान है। बोनस प्राप्त करने की अर्हता के प्रयोजन से 3500/- रु. प्रतिमाह वेतन निर्धारित किया गया है तथा बोनस का भुगतान इस शर्त के साथ, उन कर्मचारियों को किया जाएगा जो कि 2500/- रु. से 3500/- रु. प्रतिमाह के बीच मजदूरी/वेतन ले रहे हो और इसकी गणना यह मान कर की जाएगी कि वह 2500/- रु. प्रतिमाह मजदूरी अथवा वेतन ले रहा है।

केंद्रीय सरकार उन उद्योगों/स्थापनाओं के संबंध में समुचित सरकार है जिनके संबंध में औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के अंतर्गत वह समुचित सरकार है।


(iv) समान पारिश्रमिक अधिनियम, 1979

समान पारिश्रमिक अधिनियम, 1979 में समान और एक जैसी प्रकृति के कार्य के लिए पुरुष और महिला कामगारों को समान मजदूरी देने तथा स्थानांतरण, प्रशिक्षण और पदोन्नति इत्यादि के मामले में महिला कामगारों के साथ भेदभाव नहीं किए जाने का प्रावधान करता है। केंद्रीय सरकार उन उद्योगों/स्थापनाओं के संबंध में समुचित सरकार है जिनके संबंध में औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के अंतर्गत समुचित सरकार है।

(v) ठेका श्रमिक

ठेका श्रमिक (विनियमन एवं उत्सादन) अधिनियम, 1970 को कतिपय स्थापनाओं में ठेका श्रमिक के रोजगार को विनियमित करने तथा कतिपय परिस्थितियों में इसके उत्सादन करने और इनके साथ जुड़े मसलों के लिए अधिनियमित किया गया था। यह अधिनियम उन सभी स्थापनाओं व ठेकेदारों पर लागू होता है जिन्होंने 20 अथवा इससे अधिक ठेका मजदूरों को नियोजित किया हुआ है। इस अधिनियम में केंद्रीय और राज्य सलाहकार बोर्डों का गठन करने का प्रावधान है, जो संबंधित सरकारों को, इस अधिनियम को लागू करने से उत्पन्न होने वाले मामलों के बारे में सलाह देगा।

केंद्रीय सरकार ने खादानों, भारतीय खाद्य निगम के गोदामों, पत्तन न्यासों और अन्य कई उद्योगों/स्थापनाओं जिनके संबंध में यह एक समुचित सरकार है, विभिन्न श्रेणी के निर्माण कार्यों, नौकरियों में की जाने वाली प्रक्रियाओं में ठेका श्रमिकों को रोजगार देने की मनाही के लिए कई अधिसूचनाएँ जारी की। केंद्रीय ठेका श्रम सलाहकार बोर्ड ने विभिन्न स्थापनाओं में ठेका श्रम व्यवस्था पर रोक लगाने के मुद्दे की जाँच-पड़ताल करने के लिए कई समितियाँ गठित की है।

केंद्रीय सरकार उन उद्योगों/स्थापनाओं के संबंध में समुचित सरकार है, जिनके संबंध में औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के अंतर्गत समुचित सरकार है।

(vi) बाल श्रम (निषेध एवं विनियमन) अधिनियम, 1986


बाल श्रम (निषेध एवं विनियमन) अधिनियम, 1986 कतिपय खतरनाक व्यवसायों में बच्चों को रोजगार देने का निषेध करता है और कुछ अन्य क्षेत्रों में उनके रोजगार को नियंत्रित और विनियमित करता है।

केंद्रय सरकार, केंद्र सरकार अथवा रेल प्रशासन अथवा प्रमुख पत्तन अथवा खादान अथवा तेल क्षेत्रों के नियंत्रणाधीन स्थापना के संबंध में समुचित सरकार है। माननीय उच्चतम न्यायालय ने सिविल रिट् याचिका संख्या 465/86 में अपने दिनांक 10.12.1996 के निर्णय में खतरनाक व्यवसायों में काम कर रहे बच्चों को वहां से हटा कर और उन्हें पुनर्वासित करने के कतिपय निदेश दिए है। उच्चतम न्यायालय द्वारा दिए निदेशों में से एक महत्वपूर्ण निदेश बाल श्रम का सर्वेक्षण किए जाने के बारे में है। सर्वेक्षण किए जाने के मुद्दे पर केंद्रीय श्रम मंत्री की अध्यक्षता में दिनांक 22.01.1997 को दिल्ली में हुए सभी राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों के श्रम मंत्रियों, श्रम सचिवों, श्रम आयुक्तों के सम्मेलन में विचार किया गया।

सम्मेलन में विचार-विमर्श के पश्चात माननीय उच्चतम न्यायालय के निर्णय को लागू करने के क्रम में श्रम मंत्रालय ने सभी राज्य सरकारों के लिए मार्गदर्शी सिद्धांत जारी किए हैं।

(vii) स्थायी आदेशों का प्रमाणन

औद्योगिक नियोजन (स्थायी आदेश) अधिनियम, 1946, औद्योगिक स्थापनाओं में नियोक्ताओं से उनके अधीन रोजगार की शर्तों को औपचारिक रूप में परिभाषित करना अपेक्षित है। यह अधिनियम हर उस स्थापना पर लागू है जिसमें 100 या अधिक (ऐसे स्थापनों में जिनके संबंध में केंद्र सरकार समुचित सरकार है, कामगारों की संख्या कम करके केंद्र सरकार ने 50 कर दी है) कामगार कार्यरत हों तथा केंद्र सरकार अथवा रेल प्रशासन अथवा प्रमुख पत्तन, खादान अथवा तेल क्षेत्र के नियंत्रणाधीन स्थापनाओं के संबंध में केंद्र सरकार समुचित सरकार है।

औद्योगिक नियोजन (स्थायी आदेश) अधिनियम, 1946, के तहत सभी क्षेत्रीय श्रमायुक्त (कें.) को केंद्रीय क्षेत्र में प्रमाणन अधिकारी घोषित किया गया है। इस अधिनियम के अंतर्गत मुख्य श्रमायुक्त (कें.), संयुक्त श्रमायुक्त (कें.) और सभी उप मुख्य श्रमायुक्त (कें.) अपीलीय प्राधिकारी घोषित किए गए हैं।

(viii) रोजगार के घंटे का विनियमन, 1961


रोजगार के घंटे का विनियमन, 1961, कारखाना अधिनियम, खादान अधिनियम और भारतीय वाणिज्यिक पोत अधिनियम द्वारा शासित कर्मचारियों के साथ-साथ वे जिन्हें विशेष रूप से छूट प्रदान की गई हो, को छोड़कर सभी रेल कर्मचारियों पर लागू है। रोजगार के घंटों का विनियमन अधिनियम रेल के कर्मचारियों का उनके कर्तव्यों की प्रकृति जैसे अनवरतता, अनिवार्यता, सविरामता और वर्जन के आधार पर वर्गीकरण करने का प्रावधान करता है।

यह कार्य के घंटों और विश्राम की अवधि को विनियमित करता है। इस वर्गीकरण से असंतुष्ट कामगार क्षेत्रीय श्रमायुक्त (कें.) से संपर्क कर सकते हैं जिन्हें इस प्रकार के मामले निपटाने के अधिकार प्रदान किए गए हैं।

(ix) प्रसूति प्रसुविधा अधिनियम, 1961

प्रसूति प्रसुविधा अधिनियम, 1961 कतिपय स्थापनाओं में बच्चे के जन्म से कुछ समय पहले तथा बच्चे जन्म के कुछ समय बाद तक महिलाओं के रोजगार को विनियमित करता है और प्रसूति और अन्य प्रसुविधाएँ सुलभ करवाता है। यह अधिनियम कर्मचारी राज्य बीमा निगम अधिनियम, 1948 के अंतर्गत आने वाले कर्मचारियों को छोड़कर खादानों, कारखानों, सर्कस, उद्योग, बागवानी और दुकानों पर लागू है जहां 10 या उससे अधिक कर्मचारी काम करते हैं। राज्य सरकारों द्वारा इसे अन्य स्थापनाओं पर भी लागू किया जा सकता है। इस अधिनियम के अंतर्गत शामिल करने के लिए मजदूरी की कोई सीमा नहीं है। सर्कस उद्योग एवं खादानों के संबंध में केंद्र सरकार समुचित सरकार है।

(x) उपदान संदाय अधिनियम, 1972

उपदान संदाय अधिनियम, 1972 कारखानों, खादानों, तेल क्षेत्रों, बागवानी, पत्तनों, रेल मोटर परिवहन उपक्रमों, कंपनियों, दूकानों व अन्य स्थापनाओं, जिनमें दस या उससे अधिक कर्मचारी काम करते हैं पर लागू है। इस अधिनियम में किसी कामगार द्वारा की गई प्रत्येक वर्ष की सेवा हेतु 15 दिन की मजदूरी की दर से इस शर्त के अधीन कि कुल राशि दो लाख से ज्यादा न हो के उपदान के भुगतान किए जाने का प्रावधान है। आवधिक रूप से कार्य करने वाले प्रतिष्ठानों के संबंध में उपदान का भुगतान प्रत्येक सत्र में किए गए काम के सात दिन की मजदूरी के बराबर किया जाएगा। यह अधिनियम किसी कर्मचारी को किसी पंचाट अथवा नियोक्ता के साथ किए गए किसी अनुबंध के आधार पर बेहतर उपदान लेने के अधिकार को प्रभावित नहीं करता। केंद्र सरकार की अथवा उसके नियंत्रणाधीन अथवा एक से अधिक राज्यों में शाखाओं वाले अथवा केंद्र सरकार अथवा प्रमुख पत्तन, तेल क्षेत्र, रेल अथवा खादान की अथवा उसके नियंत्रणाधीन किसी कारखाने अथवा स्थापना के संबंध में केंद्र सरकार समुचित सरकार है।

(xi) औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947

औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 का अधिनियमन औद्योगिक विवादों की जाँच-पड़ताल करने एवं उनका समाधान करने तथा कतिपय अन्य प्रयोजनों का प्रावधान करने के लिए किया गया। इसमें समाधान अधिकारियों का एक विशेष तंत्र, कार्य समितियाँ, जाँच न्यायालयों, श्रम न्यायालयों, औद्योगिक अधिकरणों और राष्ट्रीय अधिकरणों की स्थापना करने उनके अधिकार, कार्य और कर्तव्य तथा उनके द्वारा अपनाई जाने वाली प्रक्रियाओं को परिभाषित करने का प्रावधान है।

यह अधिनियम, हड़ताल अथवा तालाबंदी से उत्पन्न आकस्मिकता को कानून के दायरे में रहकर सुलझाया जा सकता है, जब उन्हें अवैध अथवा गैर कानूनी घोषित कर, कामबंदी की स्थिति, छंटनी, काम से हटाना अथवा कामगार को बर्खास्त करने जैसी परिस्थितियाँ जिसके चलते कोई औद्योगिक प्रतिष्ठान बंद हो सकता है और औद्योगिक कामगार और नियोजकों से जुड़े कई अन्य मामलों को प्रतिपादित करता है।

केंद्रीय सरकार निम्न के नियंत्रणाधीन उद्योगों के संबंध में समुचित सरकार है :-

(अ) केंद्र सरकार के अथवा उसके प्राधिकार के अधीन

(ब) किसी रेल कंपनी का

(स) इस प्रयोजन से कोई नियंत्रित उद्योग

(द) अधिनियम की धारा 2(क) में गिनाए गए कतिपय उद्योगों के संबंध में


फिर भी वर्ष 1996 में एयर इंडिया कार्पोरेशन मामले में माननीय उच्चतम न्यायालय के निर्णय के पश्चात "केंद्र सरकार के नियंत्रणाधीन" केंद्रीय क्षेत्र के सभी उद्योग आ गए हैं। केंद्र सरकार ने 199 उद्योगों के संबंध में अपनी शक्तियाँ राज्य सरकारों को प्रत्यायोजित कर दी।